Father

आपकी मौजूदगी में, मैं ज़रा ख़ामोश रहता हूँ,
माँ के सामने मैं सब राज़ खोल देता हूँ।
करता हूँ मैं मनमानी कई बार, माँ को तो सदा मना लेता हूँ,
पर आपसे मैं थोड़ा, अभी भी हिचकिचाता हूँ।
डरता नहीं हूँ, बस थोड़ा सहम जाता हूँ।
मेरे सारे इल्ज़ामात ढक लेती थी माँ,
पर आपके इशारों से मैंने उसूल सीखें है।
कहते है, बहन आपके ज्यादा करीब है,
और माँ मेरे, ऐसा मुझे लगता नहीं।
माँ रोज़ फ़ोन करती है मुझे,
पर महीनों में जो आप एक बार बतलाते हो,
शायद सब कुछ जान लेते हो।
मैं यूँ तो आपसे हाल पूछता नहीं,
पता है मुझे, बड़ी फ़िक्र करते हो मेरी,
पर जताते नहीं।
अक्सर माँ से शायद पूछते हो तुम, मेरे ही बारे में।
सीखा है बहुत कुछ हुनर आपसे,
मैं बता सकता नहीं।
बचपन में मैं माँ की पसंद के कपड़े पहनता था,
पर वो अंदाज़ तो आपका ही नक़ल किया करता था।
माँ के आँचल मैं मैंने बड़ी बादशाहत की है,
पर आपके बड़प्पन से मैंने जिंदगी सीखी है।
आज मैं भले ही शायद आपसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हूँ,
पर वो तमीज़ और तहज़ीब सब आपसे ही सीखा हूँ।
खुद से ज्यादा यक़ीन, मैं आप पर करता हूँ।
तुम्हारे सिफ़ारिशों पर आज भी अमल करता हूँ।
हर जीत में मैंने माँ को याद किया है,
पर हर हार में मेरी, तुम्हें साथ पाया है।
में माँ से तो बेबाक बोलता हूँ,
पर सारे सवालात तो मैं आपसे करता हूँ।
कितनी अहमियत है, मैं बयान नही करता।
है अदब बहुत, में अदा नहीं करता।

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शेर-ओ-शायरी #2

अब तो हर एक पल भी नया इम्तिहान है।
पर उसे क्या पता, हमारी यही पहचान है।

फिर आज क्या खफा होंगे आने वाले कल से।
जो गुजरा है, उसके भी कहाँ नामोनिशान है।

और ये आँखे सुर्ख हो जाए, तो भी क्या खता।
जो मेरी रज़ा, हर एक दहलीज़ों के परवान है।

वो तितली कहीं उड़ सी गयी

वो तितली कहीं उड़ सी गयी

जो आती थी बागों में, फूलों की बाहों में
रिमझिम सी बारिश में, शीतल बौछारों में
जो कलियों से खेली, और रंगों से मैली
चंचल सी रहती, कुछ कहानी सी कहती
नन्ही परी कहीं गुम सी गई
वो तितली कहीं उड़ सी गयी

जो आती तो बहारों को संग ही लाती
फ़िज़ाओं में उसकी महक छा जाती
हमेशा जो हरदम, फुदकती सी रहती
जो छूकर निकलती, तो रेशम सी लगती
अब सिर्फ यादों में रह सी गयी
वो तितली कहीं उड़ सी गयी

भूलूँ मैं कैसे, वो उसका यूँ आना
आँगन में नई सी रौनक छा जाना
वो आती तो कानो में कुछ गुनगुनाती
धुन वो कहीं, अब छिन सी गयी
वो तितली कहीं उड़ सी गयी

Image credit @Google

इल्ज़ाम

कटघरे में खड़ा मैं, यूँ तमाशा देखता रहा।
इल्ज़ाम की बारिश में यूँ, मैं शर्म से भीगा हुआ।

वो चाल भी वो बाज भी, महसूस मैं करता रहा।
इन्साफ़ जो सीखे न थे, मैं कुछ उन्हें कहता न था।

जिनको सदा मैं यूँ ही,अपना ही समझता रहा।
वो बेहिचक बैठे हुए, अनजान यूँ बनते रहे।

है नहीं कोई शिकन, मैं यूँ न अब डरता न था।
बस जरा सा सोचता की, ख़ुदा क्यों खामोश था।

हूँ गलत या हूँ सही, ये मुझे मालूम नहीं।
गुनहगारों के काफ़िले से मुझे कोई आलम नहीं।

हर एक सबूतों के ठोकर से यूँ, वो हर एक उसूल छिलते जो हो।
फिर क्या गलत और क्या सही, जो तुम कहो हकीक़त वही।

मैं खड़ा था यूँ ही बर्फ सा, सफ़ेद था और कठोर भी।
एक धोखे से यूँ बस मुझे ,जो पानी पानी कर दिया।

जो उड़ रहा बस यूँही, खामोश भी निर्दोष भी।
फिर आज उस पंछी को यूँ, पिंजरे में कैद कर लिया।

वो कलाकार सदियों से यूँही, इल्ज़ामो के कशीदे बुनते रहे।
फिर उन्हें समझकर कफ़न, मैं मस्त यूँ सोता रहा।

 

मिट्टी के खिलौने।

मैं बचपन मैं मिट्टी के खिलौनों से खेला करता था। जब भी कोई खिलौना टूटता, मैं अक्सर रो पड़ता। फिर माँ फिर मुझे मनाती, और कहती खिलौने मिट्टी के ही तो है, फिर से जुड़ जायेंगे। यह सुनकर मैं चुप हो जाता था। पर आज माँ को याद करके सोचता हूँ तो लगता है, शायद […]

तुम हँसी हो।

This is dedicated to lovely and beautiful sisters.

तुम हँसी हो।
जो खिलखिलाती हो, तो सबको हँसा देती हो।
और जो न हँसो,
तो फिर सबसे चिढ़ जाती हो।
जब कभी नाक सिकुड़ती हो तुम,
तो ख़ामोश कर देती हो।
और जब कभी आँखें दिखाती हो,
तो अपना ख़ौफ़ जमा लेती हो।
ज़रा सी मुस्कुराती हो तुम कभी,
तो सबको लुभाती हो।
और जब चुप रहती हो तुम,
तो वक्त को भी ठहरा देती हो।
फिर जब कभी बोलने लगती हो,
तो घड़ी को भी वक्त भूला देती हो।
जब कभी गुमशुम होती हो,
तो एक पल में साँसे थाम देती हो।
जो कभी तुम सिसकती हो तो,
तो सबकी आँखें भर देती हो।
और फिर तुम अपने नाटक से,
सबको सिर पर चढ़ा लेती हो।
तो फिर ऐसे ही तुम, हँसती रहो ना सदा।
और क्यों नहीं, तुम हँसी हो।

शेर-ओ-शायरी #1

भूल रही है गालियाँ भी अब मेरे आहट को,
इस कदर में अब जूते पहननें लगा हूँ।

किताब के पन्नो में झाँककर देखा, शब्द अब धुंधले से दिखते है।
पर वो मुरझाये हुए फूल की खुशबू अभी भी बरकरार है।

उन्होंने हालचाल क्या पूछ लिया मेरा, मेने तो पूरा जहान बिखेर डाला।

इम्तिहान देते हुए सोचा की काश में वक्त जाया ना करता।
और वक्त जाया करते हुए सोचा कि काश कोई इम्तिहान ना होता।

तू मुस्कुराती रहे तो में दरिया भी पार कर लुंगा,
वरना मुझे डूबाने के लिए एक बूंद ही काफ़ी है।

मेने चलते हुए एक लदे वृक्ष से पूछा, क्या कभी बोझ महसूस नही होता।
उसने हँसते हुए कहा, छाया का क्या वज़न जनाब।